Akhiri Aansu

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Akhiri Aansu

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एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी !
गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी क्यों कि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर नें उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रक्खा था !
गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ , वैसे ही उसे याद आता, कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा - गिलहरी फिर काम पर लग जाती !
गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी तो उसकी भी ईच्छा होती थी कि मैं भी खेलु पर उसे अखरोट याद आ जाता,
और वो फिर काम पर लग जाती !
ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था !
ऐसे ही समय बीतता रहा....
एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आजाद कर दिया !
गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के ?
पूरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे !
यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है !
इन्सान अपनी ईच्छाओं का त्याग करता है, पूरी जिन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है !
60 वर्ष की ऊम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है, तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है।
क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : -
कितनी इच्छायें मरी होगी ?
कितनी तकलीफें मिली होगी ?
कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे ?
क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी जिन्दगी लग जाय और मानव उसका भोग खुद न कर सके !
इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी
तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके।
इसलिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो, BUSY पर Be + Easy भी रहो ।

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साहित्य भूषण धनंजय अवस्थी का निधन
फतेहपुर के सदरकोतवाली क्षेत्र के कमला नगर में रहने वाले वरिष्ठ साहित्यकार एवं साहित्यभूषण से नवाजे गये धनंजय अवस्थी का लंबी बीमारी के बाद आज तड़के निधन हो गया उनके निधन की सूचना पर समूचे जनपद में शोक की लहर दौड़ गई और जो भी सुना उसके पैर एकाएक उनके घर की ओर बढ़ गये।
चेहरे पर हमेशा मुस्कान विखेरने वाले वरिष्ठ साहित्यकार धनंजय अवस्थी की हंसी अब देखने को नहीं मिलेगी। फतेहपुर के कंसपुर गुगौली गांव में सन् 1933 में जन्मे धनंजय अवस्थी ने साहित्य क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान दिया और निरंतर साहित्यक गतिविधियों में लिप्त रहे। उन्होने साहित्य जगत को एक से बढ़कर एक कृति दी और जिसके चलते उनका नाम हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गया। धनंजय अवस्थी ने शबरी, राम की पाती, मिसाईलो की छांव में, हिन्दी की जय यात्रा, तुम हो पूजा मेरे मन के जैसी कृतियों की रचना कर अपना नाम साहित्य क्षेत्र में विखेर दिया। इसी के चलते 2006 का साहित्य भूषण सम्मान उन्हें 2010 में दिया गया।इनको मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, कौस्तुभ मणि सम्मान, जयशंकर सम्मान, सूफी संत महाकवि जायसी सम्मान, हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सम्मान, के साथ इनकी कविताओं का आकाशवाणी और दूरदर्शन में प्रसारण भी हो चुका है। इन सम्मानों के बाद जहां फतेहपुर जनपद गौरवान्वित हुआ वहीं वो साहित्य क्षेत्र के नये लेखकों के लिए प्रेरण स्रोत भी बन गये। हांलाकि उनकी दो कृतियां आंचल की साधना और विदुर प्रकाशनाधीन थी जिसे वो शीघ्र ही प्रकाशित करने वाले थे आगरा यूनिवर्सिटी से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद आईटीपी का कोर्स भी किया आज जहां उनकी मृत्यु के बाद समूचा जिला शोक की लहर में डूबा है वहीं वो अपने पीछे अपने दो पुत्र छोड़ गये है।

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